घोटाला एक्सप्रेस के इंजन पर बैठे मोहन महाराज

 *घोटाला एक्सप्रेस के इंजन पर बैठे मोहन महाराज!*

लेखक इरशाद खान 


मध्यप्रदेश बड़ा अद्भुत प्रदेश है। यहां कभी व्यापमं देशभर में सुर्खियां बटोरता है, कभी पोषण आहार, कभी डंपर, कभी खनन और अब ऐसा लगने लगा है कि घोटालों की परंपरा को संरक्षित करने के लिए सरकारें विशेष प्रयास कर रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले घोटाले खबर बनते थे, अब खबरों के बीच कभी-कभी विकास दिखाई दे जाता है।


मोहन यादव सरकार को सत्ता संभाले ढाई साल से ज्यादा हो चुके हैं। मुख्यमंत्री जी मंचों पर बताते हैं कि मध्यप्रदेश विकास के पथ पर दौड़ रहा है। निवेश आ रहा है, उद्योग आ रहे हैं, रोजगार आएंगे, खुशहाली आएगी। लेकिन जनता बड़ी कन्फ्यूज है। उसे समझ नहीं आ रहा कि विकास की गाड़ी किस पटरी पर दौड़ रही है, क्योंकि अखबार खोलो तो कहीं छात्रवृत्ति घोटाला दिखाई देता है, कहीं जमीन विवाद, कहीं आवास योजना की गड़बड़ी, कहीं खनन माफिया की चर्चा, कहीं फर्जी कॉलेजों का खेल और कहीं सरकारी पैसों की बंदरबांट की खबर।


ऐसा लगता है कि मध्यप्रदेश सरकार ने विकास के लिए अलग विभाग और घोटालों के लिए अलग विंग बना रखा है।


प्रदेश का आम आदमी बड़ा भोला है। उसे लगता था कि सरकार बदलने से व्यवस्था बदल जाएगी। लेकिन व्यवस्था ने साबित कर दिया कि सरकारें बदलती हैं, कुर्सियां बदलती हैं, नेम प्लेट बदलती हैं, केवल फाइलों की कहानियां नहीं बदलतीं।


सबसे पहले बात करते हैं छात्रवृत्ति की। सरकार बच्चों को पढ़ाना चाहती है, लेकिन कुछ महानुभावों ने सोचा कि पढ़ाई से ज्यादा जरूरी अपना भविष्य सुरक्षित करना है। नतीजा यह हुआ कि छात्रों के नाम पर फर्जी खाते खुल गए और छात्रवृत्ति का पैसा ऐसे उड़ गया जैसे शादी में हेलीकॉप्टर से फूल बरसाए जाते हैं। छात्र किताबों के लिए भटकते रहे और कुछ लोग सरकारी खजाने पर ज्ञान प्राप्त करते रहे।


सरकार ने कहा कार्रवाई होगी।


जनता ने पूछा कब?


सरकार बोली जांच चल रही है।


जनता ने पूछा कितने साल चलेगी?


सरकार मुस्कुरा दी।


यही मुस्कान आज मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी प्रशासनिक नीति बन चुकी है।


फिर आवास योजनाओं की कहानियां सामने आईं। जिन गरीबों को छत मिलनी थी, उनके सपनों पर भी कमीशन का प्लास्टर चढ़ गया। गरीब सोचता रहा कि सरकार उसका घर बनाएगी और कुछ लोगों ने सोचा कि पहले अपना भविष्य मजबूत कर लिया जाए। आखिर गरीब की उम्मीद और सरकारी योजना के बीच जितनी दूरी होती है, उतनी दूरी भोपाल से दिल्ली की भी नहीं होती।


खनन की बात करें तो मध्यप्रदेश की नदियां अब नदी कम और एटीएम ज्यादा लगती हैं। जहां रेत दिखी, वहां मशीन पहुंच गई। जहां पहाड़ दिखा, वहां खुदाई शुरू हो गई। सरकार दावा करती है कि सब नियंत्रण में है। लेकिन जनता पूछती है कि अगर सब नियंत्रण में है तो फिर नियंत्रण किसके हाथ में है?


मध्यप्रदेश में अवैध खनन एक ऐसा चमत्कार है जो हर सरकार में जीवित रहता है। सरकारें आती हैं, जाती हैं, मंत्री बदलते हैं, अधिकारी बदलते हैं, लेकिन रेत माफिया की सेहत हमेशा अच्छी रहती है।


अब आते हैं उस विषय पर जिसने राष्ट्रीय राजनीति में भी सुर्खियां बटोरीं। उज्जैन क्षेत्र में जमीन खरीद से जुड़े मामले पर मीडिया रिपोर्टें सामने आईं। आरोप लगे कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार और उनसे जुड़ी संस्थाओं द्वारा खरीदी गई जमीनों के आसपास विकास परियोजनाओं की संभावनाओं ने कई सवाल खड़े किए। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया। मुख्यमंत्री ने आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।


लेकिन जनता की समस्या यह है कि उसे राजनीति की भाषा समझ नहीं आती। उसे सिर्फ इतना समझ आता है कि जब आम किसान की जमीन का मुआवजा तय होता है तो उसे वर्षों चक्कर लगाने पड़ते हैं और जब बड़े लोगों की जमीनों की चर्चा होती है तो करोड़ों के आंकड़े हवा में उड़ने लगते हैं।


जनता सवाल पूछती है तो उसे विपक्षी कहा जाता है।


पत्रकार सवाल पूछता है तो उसे एजेंडा बताया जाता है।


और अगर कोई लगातार सवाल पूछे तो उसे राष्ट्रविरोधी, विकास विरोधी और न जाने क्या-क्या घोषित कर दिया जाता है।


लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध अब भ्रष्टाचार नहीं, सवाल पूछना बनता जा रहा है।


मोहन सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उसने "जांच" शब्द को अमर कर दिया है। कोई भी मामला सामने आए, जवाब एक ही जांच होगी।


कभी-कभी लगता है कि मध्यप्रदेश में जांच आयोगों की आबादी जल्द ही गांवों की आबादी से ज्यादा हो जाएगी।


सरकार कहती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस है।


यह वाक्य इतना ज्यादा बोला जा चुका है कि अब यह सरकारी विज्ञापन का स्थायी स्लोगन बन सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि जनता जब यह सुनती है तो उसे हंसी आने लगती है।


जीरो टॉलरेंस का मतलब शायद यह है कि भ्रष्टाचार को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, इसलिए उसे फाइलों में सुरक्षित रखकर जांच के लिए भेज दिया जाएगा ताकि वह लंबे समय तक जीवित रह सके।


मध्यप्रदेश में इन दिनों एक नया मॉडल दिखाई दे रहा है। पहले योजना बनती है, फिर उद्घाटन होता है, फिर विज्ञापन छपते हैं, फिर फोटो खिंचते हैं, फिर विवाद आता है, फिर जांच होती है, फिर मामला ठंडा पड़ जाता है। इसे ही शायद प्रशासनिक चक्र कहते हैं।


मुख्यमंत्री जी निवेश सम्मेलनों में करोड़ों-अरबों के एमओयू गिनाते हैं। जनता राशन की दुकान पर खड़ी होकर सोचती है कि उन अरबों में से उसके हिस्से में क्या आया? किसान सोचता है कि उसकी फसल का दाम कब मिलेगा। बेरोजगार सोचता है कि नौकरी कब मिलेगी। और पत्रकार सोचता है कि अगला घोटाला किस विभाग से निकलेगा।


मध्यप्रदेश की राजनीति का दुर्भाग्य यह है कि यहां घोटाले विपक्ष का मुद्दा नहीं, जनता का अनुभव बनते जा रहे हैं। जब हर दूसरे दिन कोई नया विवाद सामने आता है तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर प्रशासनिक जवाबदेही नाम की चीज बची भी है या नहीं।


सरकार अगर सचमुच पारदर्शिता चाहती है तो हर विवादित मामले की निष्पक्ष जांच कराए, रिपोर्ट सार्वजनिक करे और दोषियों पर कार्रवाई करे। लेकिन समस्या यह है कि कार्रवाई से ज्यादा ऊर्जा अक्सर सफाई देने में खर्च होती है।


आज स्थिति यह है कि प्रदेश में सड़क टूट जाए तो जनता कहती है।कोई बात नहीं।


बिजली चली जाए तो जनता कहती है चलो ठीक है।


लेकिन यदि कोई नया घोटाला सामने न आए तो जनता को आश्चर्य होने लगता है।


यानी घोटाले अब अपवाद नहीं, व्यवस्था का हिस्सा महसूस होने लगे हैं।


अंत में बस इतना ही मध्यप्रदेश में विकास की गाड़ी जरूर चल रही होगी, लेकिन उसके पीछे घोटालों का इतना लंबा डिब्बा जुड़ गया है कि इंजन दिखाई ही नहीं दे रहा। मुख्यमंत्री मोहन यादव उस इंजन के चालक हैं। अब जिम्मेदारी उनकी है कि वे इस घोटाला एक्सप्रेस को जवाबदेही के स्टेशन पर रोकें या फिर यह गाड़ी आरोपों, विवादों और जांचों के धुएं के बीच आगे बढ़ती रहे। क्योंकि जनता अब भाषण नहीं, हिसाब मांग रही है। और लोकतंत्र में जनता का हिसाब सबसे कठिन परीक्षा होती है।


*(यह लेख व्यंग्य है। इसमें उल्लिखित विवादों और आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए; संबंधित मामलों में जांच, राजनीतिक विवाद या पक्ष-विपक्ष के दावे शामिल हो सकते हैं।)*

All

Post a Comment

0 Comments