सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के विरोध में जवाहर लाल नेहरू ने लिखे थे 17 लेटर, बीजेपी ने शेयर किया पत्र, लिखा- आजाद भारत में सोमनाथ से सबसे अधिक नफरत पंडित नेहरू को थी
नेहरू और सोमनाथ मंदिर: 17 पत्रों का विवाद
हाल ही में (जनवरी 2026 में), 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के अवसर पर भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों और पत्रों का हवाला दिया। भाजपा का दावा है कि पंडित नेहरू ने 1950-51 के दौरान सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और इसके उद्घाटन समारोह के विरोध में 17 से अधिक पत्र लिखे थे।
भाजपा के मुख्य आरोप:
'सोमनाथ से नफरत': भाजपा ने आधिकारिक तौर पर कहा कि "आजाद भारत में सोमनाथ से सबसे अधिक नफरत पंडित नेहरू को थी।"
तुष्टीकरण की राजनीति: भाजपा का आरोप है कि नेहरू ने 'अंध तुष्टीकरण' के कारण मंदिर के पुनर्निर्माण का विरोध किया और मुगल आक्रांताओं के इतिहास को दबाने की कोशिश की।
पाकिस्तान को स्पष्टीकरण: भाजपा ने दावा किया कि नेहरू ने तत्कालीन पाकिस्तानी पीएम लियाकत अली खान को पत्र लिखकर सोमनाथ मंदिर के काम को "महत्वहीन" बताया था ताकि उन्हें खुश रखा जा सके।
नेहरू के पत्रों में क्या था? (भाजपा के दावे के अनुसार):
भाजपा द्वारा साझा किए गए विवरणों के अनुसार, नेहरू ने इन पत्रों में निम्नलिखित आपत्तियां दर्ज की थीं:
सरकारी भागीदारी का विरोध: नेहरू का मानना था कि एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) सरकार को किसी धार्मिक स्थल के निर्माण या उसके उद्घाटन समारोह से नहीं जुड़ना चाहिए।
राष्ट्रपति को सलाह: उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर सलाह दी थी कि वे मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल न हों। नेहरू ने इसे "हिंदू पुनरुत्थानवाद" (Hindu Revivalism) का नाम दिया था।
मीडिया कवरेज पर रोक: नेहरू ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को निर्देश दिया था कि सोमनाथ मंदिर के समारोह की सरकारी मीडिया कवरेज को कम से कम रखा जाए।
विदेशी दूतावासों को निर्देश: उन्होंने भारतीय दूतावासों को निर्देश दिया था कि वे सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी प्रकार की सहायता (जैसे पवित्र नदियों का जल मंगाने में) न दें।
पाकिस्तान को पत्र: नेहरू ने 21 अप्रैल 1951 को लियाकत अली खान को लिखे पत्र में सोमनाथ मंदिर के दरवाजों को अफगानिस्तान से वापस लाने की खबरों को "पूरी तरह गलत" बताया था।
कांग्रेस का पलटवार (Counter-Argument):
इस मामले पर कांग्रेस ने भाजपा पर "आधे-अधूरे सच" और "झूठ" फैलाने का आरोप लगाया है। कांग्रेस का कहना है:
नेहरू का विरोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिद्धांतों पर आधारित था। वे सरकारी खजाने का पैसा किसी भी धार्मिक निर्माण में खर्च करने के खिलाफ थे, जो महात्मा गांधी और सरदार पटेल की भी शुरुआती सोच थी।
नेहरू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को जाने से मना जरूर किया था, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वे अपनी "व्यक्तिगत क्षमता" में वहां जा सकते हैं, न कि देश के राष्ट्रपति के तौर पर।




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